योग वशिष्ठ सार

योग वशिष्ठ सार (गुरु और शास्त्र)


गुरु और शास्त्रों के अभ्यास से जब अंतःकरण पवित्र होता है, तब आत्मसत्ता स्वाभाविक ही प्रकट होती है।

गुरु और शास्त्र हृदय के मलिन भावों को दूर करते हैं और जब हृदय की मलिनता हट जाती है तो आत्मसत्ता स्वतः ही प्रकट हो जाती है।

ह्रदय की मलिनता गुरु और शास्त्रों के संग से दूर होती है लेकिन इनकी भावना भी द्वैत में ही होती है। वह भावना(कल्पना) भी इस दृश्य संसार के भ्रम का नाश करने वाली है।

परमार्थ की दृष्टि से गुरु और शास्त्र भी द्वैत में ही कल्पित हैं और अज्ञानी की दृष्टि में गुरु और शास्त्र आत्मज्ञान में सहायक हैं; और निश्चय ही इनके सतत अभ्यास से जीव आत्मपद की प्राप्ति कर लेता है।

शास्त्र तो एक ही है, परन्तु जो पदार्थ हैं उनमें भेद है। जैसे गन्ने के रस से मिश्री, गुड़, शक्कर आदि बनते हैं, उसी प्रकार शास्त्र एक ही है, उसमें पदार्थ अलग एवं भिन्न-भिन्न हैं। जिस भाव से जो यत्न करते हैं उसी को वे प्राप्त होते हैं।

शास्त्रों में सब कुछ है, भोग भी और मोक्ष भी। अज्ञानी जीव भोग के लिए साधन करते हैं, परन्तु वे लोग भी धन्य हैं क्योंकि शास्त्र की शरण तो लिये। उन्हें भी किसी-न-किसी काल में आत्मपद की प्राप्ति अवश्य होगी। लेकिन आत्मपद की प्राप्ति के लिये ही शास्त्रों का सेवन करना चाहिए। सुन-सुनकर सतत अभ्यास करने से एवं चिंतन-मनन करने से आत्मपद अवश्य प्राप्त होगा। आत्मपद की प्राप्ति हो जाने पर सब प्रकार से समभाव प्रकट होगा। जिस प्रकार सूर्य के उदित होने पर सब ओर प्रकाश ही प्रकाश होता है, वैसे ही जब सब तरफ समता होती है, तब सुषुप्ति जैसी अवस्था होगी अर्थात एक ओर द्वैत की कल्पना भी मिट जाएगी और अद्वैत में भी जाग्रत का सहज अनुभव होगा। परन्तु यह सब शास्त्रों के अभ्यास और संतों के संग से ही संभव है।

जो लोग जीवों को संसार-सागर से पार लगाते हैं वे ही परोपकारी संतजन हैं। उनका संग करने से परम कल्याणकारी आत्मपद की प्राप्ति होती है।

हे रामजी! शास्त्र और गुरु नेति-नेति कहकर सब बताते हैं यानी अनात्मा का निषेध करके आत्मतत्व का उपदेश करते हैं। जब अनात्मा का निषेध होगा तो आत्मतत्व ही शेष रहेगा। उसको जानने के बाद और कुछ भी जानना शेष नहीं रह जाता है।

आत्मतत्व को जानने में कुछ भी कठिनाई नहीं है, केवल आवरण दूर करने में ही यत्न है।

जिस प्रकार सूर्य के सामने बादल आ जाता है तो सूर्य दीखता नहीं, इसलिए बादलों को ही दूर करने में यत्न है, सूर्य के प्रकाश के निमित्त कुछ भी यत्न नहीं करना है। जब बादल दूर होंगे तो सूर्य का प्रकाश स्वाभाविक ही प्रकट होगा।

ठीक उसी प्रकार गुरु और शास्त्र के अभ्यास से जब अहंकाररूपी आवरण दूर होता है तब स्वयं प्रकाशित आत्मा चमचमाता है।

सात्विक गुणों से युक्त जो शास्त्र एवं गुरु हैं उनके सेवन से जब रज और तमादि गुणों का अभाव होता है तब वह परम अनुभवस्वरूप आत्मज्योति अकस्मात् प्रकाशमान होने लगती है। जब वह प्रकाश होता है तो उससे जीव आत्मोन्मत्त हो जाता है और उसकी संसार की द्वैत कल्पना चली जाती है। इस तरह ग्यानी आत्मपद प्राप्त कर हर क्षण मुक्ति का अनुभव करता है। उसका उपाय मात्र शास्त्रों का विचार एवं चिंतन ही है।


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