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सद्गुरु की महिमा

गुरु की महिमा


एक बार माता पार्वती ने भगवान सदाशिव से पूछा- हे भगवन! सम्पूर्ण जगत आपकी पूजा-अराधना करता है, आपको प्रणाम करता है, परन्तु आप किसको नमस्कार करते हैं? आप तो देवाधिदेव है, महादेव हैं, सबके पूजनीय हैं। सम्पूर्ण ऋषियों-मुनियों, देवी-देवताओं, गन्धर्वों, मानवों एवं दूसरे सभी जीवधारियों द्वारा आपकी पूजा-उपासना की जाती है, वे सब आपको प्रणाम करते हैं मगर ऐसा कौन है इस जगत में, इस संसार में जो आपके प्रणाम करने योग्य है?

पार्वती जी की यह बात सुनकर महादेव हँसे और मधुर वाणी में बोले-

हे प्रिये! हे पार्वती! हे देवी! तुम्हारा यह प्रश्न अत्यंत कल्याण करने वाला है और सम्पूर्ण रहस्यों का भी रहस्य है। इसलिए कहना उचित नहीं है। पहले भी कभी भी किसी से नहीं कहा। फिर भी तुम्हारी पवित्र भक्ति एवं अत्यंत जिज्ञासा देखकर इसका रहस्य तुम्हें सुनाता हूँ।

हे देवी! तुम आत्मस्वरूप हो, मेरा ही स्वरुप हो, इसलिए यह गूढ़ रहस्य तुमको कहता हूँ। तुम्हारा यह प्रश्न संसार का कल्याण करने वाला है। ऐसा प्रश्न कभी भी पूर्व में किसी ने नहीं किया।

जो सच्चे भक्त हैं, जिनका ईश्वर में अनन्य प्रेम है, विश्वास है और ऐसा ही विश्वास एवं भक्ति गुरु में भी है, ऐसे उच्च कोटि के साधक ही इस गूढ़ रहस्य को समझ सकते हैं।

जो सदगुरु हैं वे ही शिव हैं तथा जो शिव हैं वे ही सदगुरु हैं। दोनों में कोई भेद नहीं है। जो भेद मानता है वह महापापी है।

जो भी लोग गुरु तत्त्व को नहीं जानते हैं वे भ्रान्ति में हैं, वे भ्रमित जीवों की तरह संसार के भयानक चक्र में भटकते रहते हैं। उनके सारे पुण्य कर्म, जप, दान, तीर्थ, व्रत-उपवास सब कुछ व्यर्थ ही चला जाता है।

सम्पूर्ण विद्याएँ, शास्त्र, पुराण, इतिहास आदि का ज्ञान तथा सब मत और मतान्तर, गुरु तत्त्व को जाने बिना अपने लक्ष्य से भटका देते हैं।

हे देवी! गुरु ही आत्मा हैं और आत्मा ही गुरु है। इससे अन्य कुछ भी सत्य नहीं है, सत्य नहीं है। इसलिए आत्मज्ञान को पाने के लिए जिज्ञासुओं और बुद्धिमानों को सतत प्रयत्न करना चाहिए।

ये संसार अविद्यारूपी अंधकार से पूर्ण है और अति मायामय है, और यह शरीर भी तो अज्ञान से ही प्रकट हुआ है। इस प्रकार का रहस्यमय ज्ञान जिनकी कृपादृष्टि से प्राप्त होता है वे ही तो गुरु है।

हे शिवे! जिस गुरुदेव की चरणसेवा एवं चरण-वन्दना से मनुष्य सब पापों से मुक्त होकर ब्रम्हरूप हो जाता है उस सच्चे गुरु की महिमा तुमसे कहता हूँ।

गुरुदेव का चरणामृत मनुष्यों को पापरूपी कीचड़ से निकालने वाला है। ज्ञान रूपी तेज को पूर्ण करने वाला है और संसार-समुद्र से पूर्णतया पार लगाने वाला है।

जो अज्ञान का मूल है, जड़ है उस अविद्या को श्री गुरुदेव उखाड़ फेंकते हैं, जन्मों-जन्मों के पापों को नष्ट कर देते हैं तथा ज्ञान और वैराग्य की प्राप्ति कराते हैं। ऐसे परम पावन सद्गुरुदेव के चरणामृत का सेवन करना चाहिए।

अपने गुरुदेव के नाम का जप एवं कीर्तन अनादिदेव भगवान शिव का ही कीर्तन हैं। अपने सद्गुरुदेव का चिंतन आदि-अनामय भगवान शिव का ही चिंतन हैं।

गुरुदेव जहाँ निवास करते हैं वह पवित्र स्थान ही काशी क्षेत्र हैं। श्री गुरुदेव के चरणों का जल ही पवित्र गंगाजी हैं। सद्गुरुदेव तो साक्षात् पूर्णब्रम्ह हैं और निश्चित ही साक्षात् विश्वनाथ हैं।

 

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