For English Translation CLICK HERE

महायोगी तपसी सरकार का जीवन

सरकार जी एवं गुरु जी का संवाद


एक बार एक भक्त ने पूज्य गुरु जी से पूछा था,"गुरु जी! जब आप सरकार जी के साथ थे तो उस समय उनके सानिध्य में रहने पर कैसा अनुभव होता था? उनका कैसा व्यक्तित्व था?"

गुरु जी ने बहुत ही भावपूर्ण उत्तर दिया-

सबसे बड़ी बात तो ये थी कि सन् २००० में कनखल स्वामी का आगमन हुआ। उस समय उन्होंने आठ प्रमुख चीजें कही थीं। उसमें उन्होंने कहा था,"जो मांगना है मांग लो।" तो उस समय मेरे कंठ में आया,"मैं हनुमान जी की शरण में जाना चाहता हूँ।"

इस घटना के करीब चार-पांच साल बाद मुझे ये अवसर मिला और जब वे (सरकार जी) आये तो उन्होंने मेरा नाम लेकर वहाँ के सांसद द्वारा बुलवाया।

जब मैं उनसे मिला तो ऐसा लगा जैसे कई जन्मों का रिश्ता हो। मुझे देखकर उनके मुख से यही शब्द निकले,"भई, देखो, यहाँ पर तो मैं रहूँगा। जिंदगी में मुझे मनोरमा पर ही जाना है, अपनी तपोभूमि पर। और यहीं तुमको भी आना है।" शायद मुझे वह बात आई-गयी लगी, लेकिन बाद में उनके प्रति जो आकर्षण था, एक ऐसा खिंचाव था कि हर पांच-छ: दिन में मैं यहाँ से(गोरखपुर से) निकल लेता था मनोरमा नदी पर और वे(सरकार जी) अकेले कुटिया में रहते थे। सानिध्यता मिलती थी, अवसर मुझे दिन भर मिलता था। रात्रि में वहाँ रुकने का अवसर नहीं मिलता था क्योंकि वे रुकने भी नहीं देते थे किसी को। उसके पीछे क्या तथ्य था पता नहीं लेकिन रात्रि विश्राम मुश्किल हो जाता था कभी-कभी। दिन भर वे कुछ-न-कुछ करते रहते थे। उनका बोलना भी क्या था! बोलना शब्द नहीं था उनके पास। नि:शब्द थे वे लेकिन नि:शब्द होकर भी हलचल रूप में होते थे। उनके अंदर अथाह शान्ति थी।

जो सबसे बड़ी चीज थी वह यह कि उनके चेहरे को देखकर, उनके पास बैठकर जो शांति मिलती थी वह अतुलनीय थी और ऐसा लगता था जैसे सारे जीवन के जो कष्ट हों, कहाँ चले गए अपने आप! ऐसी अनुभूति मिलती थी उनकी शरण में रहकर। जितना समय वहाँ रहना होता था, कुछ-न-कुछ सेवा करते ही रहते थे। हर व्यक्ति की अपनी इच्छा होती थी।

कोई झाड़ू लगा रहा है, कोई सफाई कर रहा है, कोई नदी के किनारे आश्रम की जगह साफ कर रहा है। मतलब हर कोई कुछ-न-कुछ करता ही रहता था।

लेकिन उनके व्यक्तित्व का जो आवरण था, वह बहुत गहरा था। कुछ समझना बड़ा मुश्किल था।

कभी वे लगते थे बहुत वृद्ध हैं, कभी वे लगते थे कितने ताकतवर हैं, और वह स्वरुप ही बड़ा विचित्र लगता था।

और जहाँ वे कभी चालीस साल पहले बैठे हुए थे, वहाँ एक पीपल का पेड़ था। वहाँ एक गुफा भी थी। पीपल का पेड़ उस समय बहुत हरा-भरा था लेकिन अब जब वे आये तो वह पेड़ पूरा सूख चुका था।

संयोग था कि उस दिन वहाँ सरसों के कुछ पेड़ जमे थे उसके नीचे, और जब मैं गोरखपुर से वहाँ पहुँचा तो वे सरसों के पत्ते तोड़ रहे थे साग बनाने के लिए। मैं भी बैठ गया और तोड़ने लगा। पेड़ की तरफ मेरी निगाह गयी तो देखा कि वह सूखा हुआ था। मैंने उनसे कहा,"सरकार जी, पेड़ तो सूख गया है, इसको कटवा देना चाहिए।"


उन्होंने कहा,"नहीं भईया, काहे कटवा देबअ?"(क्यों कटवा दोगे?) "अब हम आ गए हैं न। यहीं के नीचे हमार पूरा जीवन बीता है। (इसी के नीचे हमारा पूरा जीवन बीता है।) अभी कुछ दिन बाद देखिये, वह हरा-भरा हो जायेगा।" उस समय भी मेरे मन में बड़ी चिंता उठी कि सूखा हुआ पेड़ कैसे हरा-भरा हो जायेगा।

जारी है