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महायोगी तपसी सरकार का जीवन

सुबह के ४:३० बज रहे थे। उसी समय मेरे पिताजी का फोन आया. उन्होंने मुझसे पूछा,"अरे, अभी तुम कहाँ पर हो?"

मैंने उत्तर दिया,"मैं घर पर ही हूँ।"

पिताजी ने पूछा,"अरे! वहाँ क्या कर रहे हो? इसी वक्त आश्रम पहुँचो। सरकार जी समाधि ले लिए हैं। रात्रि १२:०५ बजे ही।"

मैंने उनसे कहा,"आप ये क्या बोल रहे हैं? सरकार जी अभी-अभी हमारे घर आये थे." पिताजी ने मेरी बात अनसुनी कर दी और फोन रख दिया।

मैं अत्यन्त भावविभोर होकर रोने लगा और जैसे-तैसे आश्रम पहुंचा तो मैंने देखा कि सचमुच सरकार जी समाधि ले लिए थे। मैं खूब रोया। खूब रोया।

सरकार जी का वह दिव्य स्वरुप, करुण हृदय, भक्तवत्सल! मुझे कितना प्रेम करते थे! सब कुछ मेरी आँखों के सामने प्रत्यक्ष दिख रहा था। सरकार जी की लीला का कोई पार नहीं। वे तो स्वयं हनुमान जी के अवतार ही हैं। मेरे सरकार जी के चरणकमलों मेरा कोटि-कोटि प्रणाम!

जय सरकार

महासमाधि (जीवित समाधि) १७ अप्रैल, समय ००.०५ बजे.

गुरु जी के साथ रात्रि में घटित बस वाली घटना एवं सरकार जी की महासमाधि का समय एक ही था. इधर मनोरमा तट पर सभी लोग सरकार जी की महासमाधि की तैयारियाँ पूर्ण कर चुके थे और उधर गुरु जी के साथ बस वाली घटना घटी थी. जब ऑटोरिक्शा रात में गुरु जी समीप रुका तो उस समय ठीक १२ बजकर ५ मिनट हुआ था जो कि १६-१७ अप्रैल २००९ की मध्य रात्रि थी।

सरकार जी ने अपने योगबल से जीवित समाधि ली थी। समाधि धारण करने से पूर्व उनके सम्पूर्ण शरीर पर शीतल चन्दन का सुगन्धित लेप किया गया था। जब सरकार जी ने जीवित समाधि ली, उसके १२-१३ घंटे पश्चात् भी उनका शरीर एकदम कोमल था. शरीर के किसी भी भाग में कहीं भी कोई अकड़न नहीं थी. उनका शरीर बिलकुल तरोताजा एवं जीवंत दीखता था.

सबसे महत्वपूर्ण बात तो ये थी कि सरकार जी ने जीवित समाधि ली थी।

सरकार जी की समाधि से सम्बंधित एक बहुत ही महत्वपूर्ण घटना है।

एक बार गुरु जी के पिता श्री सुधाकर मिश्रा ने एक बहुत ही सुन्दर पलंग बनवाया और उसे सरकार की सेवा में अर्पण करने गए। उनको मन में ये विश्वास था कि सरकार जी इससे बहुत खुश होंगे और उसे स्वीकार कर लेंगे। परन्तु सरकार जी ने थोड़ा नजर अंदाज करते हुए कहा,"हटाओ इसे! उधर कबाड़ में डाल दो." सरकार जी की आज्ञा कौन टाल सकता था? बिलकुल नया सुन्दर पलंग को बाहर कबाड़ में रख दिया गया।

सुधाकर मिश्रा को मन को बहुत ठेस पहुंची और वे निराश हो गए. वे सोचे थे कि सरकार जी खुश होंगे, मगर इसके विपरीत ही हुआ. परन्तु वे सरकार जी के परम भक्त थे, इसलिए उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, मगर उन्हें निराशा तो अवश्य हुई थी।

गुरु कभी-कभी शिष्य के अहंकार को तोड़ने के लिए इस तरह की परीक्षाएं किया करते हैं.

अब वह पलंग पाँच-छ: महीने तक बाहर खुले में पड़ा रहा. धूल जम गयी थी उस पर। समाधि से तीन महीने पूर्व सरकार जी ने भक्तों से कहा,"अरे! वहां जो पलंग पड़ा है न? उसे साफ-सुथरा करके अंदर रखो, अब मैं उसी पर सोऊंगा." इस तरह सरकार जी तीन महीने तक उस पलग को अपने विश्राम के लिए उपयोग में लिया और आश्चर्य तो तब हुआ जब उन्होंने उसी पलंग पर समाधि ली।

सरकार की लीला सरकार ही जानें।

सरकार जी के उपयोग में आने वाली सभी चीजें अभी भी जीवंत मालूम पड़ती हैं और शिष्यों की अमूल्य धरोहर हैं।

सरकार जी का समाधि दिवस प्रत्येक वर्ष १७ अप्रैल के दिन बड़े ही भावपूर्ण ढंग से एवं धूमधाम से आयोजित किया जाता है और भंडारे आदि भी रखे जाते हैं।

यह दिन सरकार जी के भक्तों एवं शिष्यों के लिए परम पावन दिन है। सरकार जी के कृपा-कटाक्ष से सबका मंगल होता रहे, यही हमारी प्रार्थना है।

जारी है