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महायोगी तपसी सरकार का जीवन

भारतभूमि समय-समय पर महान ऋषियों और संतों को जन्म देती रही है। इस पावन भूमि पर अनेकों अवतारी महापुरुषों का जन्म हो चुका है। इस संसार के भयानक दुःखालय में फंसे जीवों को शांति और मुक्ति प्रदान करने के लिए अनगिनत महापुरुषों ने अपना सर्वस्व तक न्योछावर कर दिया। चाहे वो राम हों या कृष्ण हों, नानक हों या कबीर हों- ये सब संसार-चक्र में बुरी तरह उलझे जीवों की मुक्ति के निमित्त एवं शाश्वत ईश्वर की अनुभूति कराने के लिए अपने कष्टों की परवाह किये बिना हँसते-हँसते इतिहास में अमर हो गए।

लोग संतों-महापुरुषों के आशीर्वाद से अपने दुःखों का अंत तो पा लेते हैं मगर ये नहीं समझ पाते कि इस सत्य की खोज में उन महान आत्माओं ने कितने-कितने कष्ट सहे हैं। जिन महापुरुषों ने आत्मा का साक्षात्कार कर लिया, उन्हें सारा जगत आत्मस्वरूप ही दिखता है।

जैसे भगवान विष्णु, भगवान शिव आदि देवों के कई अवतार धर्मशास्त्रों में वर्णित हैं। ये सभी अवतार संसार में किसी-न-किसी निमित्त से हुए हैं। राम, कृष्ण, दुर्गा, काली आदि अवतार इसी श्रेणी में आते हैं। इन अवतारों ने अपने प्रभाव से समय की धारा को ही परिवर्तित करके रख दिया था।

क्रमशः चारों युगों में दिव्य अवतार हुए, जिनकी पूजा-आराधना आज भी मानव अपने जीवन के कल्याण के लिए कर रहा है।

इसी क्रम में भगवान श्रीराम के महान भक्त महाबली हनुमान जी का अवतरण भी रोचक है।

सूर्य के सामान देदीप्यमान व्यक्तित्व के रूप में परम कृपालु महाबली हनुमान जी ने एक महायोगी का अवतार धारण किया और भक्तों पर कृपा कर उन्हें सत्य का मार्ग दिखाने के लिए भारतवर्ष में उत्तर प्रदेश राज्य के बस्ती जिले (गोरखपुर के पास) में ८ दिसम्बर २००५, दिन गुरूवार की मंगलमय सुबह में समय १० बजे हरैया गाँव में कलकल बहती "मनोरमा" नामक पौराणिक नदी के पावन तट पर प्रगट हुए। उनके व्यक्तित्व का तेज देखकर लोगों ने उन्हें कोई महान तपस्वी समझा और उन्हें "तपसी सरकार"(तपस्वी सरकार) नाम से जानने लगे क्योंकि वे तपस्या की साक्षात् मूर्ति ही दीख पड़ते थे। वे ज्यादातर साधना-ध्यान में ही लीन रहते थे। वे हरैया के लोगों के लिए भगवान ही थे। उनकी उपस्थिति मात्र से सब तरफ सुख-शांति और समृद्धि छा गयी। लोग उन्हें आदरवश "सरकार" कहकर सम्बोधित करते थे।

"वास्तव में वे कौन थे?" यह सामान्य मनुष्यों के लिए जानना संभव नहीं था।

वे मनोरमा तट पर ही क्यों आये? अन्य तीर्थों जैसे गंगा, यमुना आदि पवित्र स्थानों को भी चुन सकते थे? वहां अपना निवास बना सकते थे? इन सभी रहस्यमय प्रश्नों के उत्तर तो स्वयं गुरूजी ही दे सकते है। फिर भी हमने अपनी तुच्छ बुद्धि से शास्त्रों के आधार पर जो कुछ महसूस किया है उसे कहता हूँ-

पौराणिक दृष्टि से देखा जाय तो पवित्र धर्मनगरी एवं प्रभु श्रीराम की जन्मस्थली "अयोध्या" की धरती को अपने शीतल व पवित्र जल से पावन करती "सरयू" नदी की ही एक धारा निकल कर बस्ती जिले में हरैया गाँव से होकर गुजरती है जिसे "मनोरमा" नदी के नाम से जाना जाता है।

जारी है